Saturday, 17 October 2015

दरिंदगी के शिकार : वो परिवार

आओ तुमको बात बताउं,
पीड़ित उन परिवारों की
दरिंदगी में कुचले गए,
उन अनगिनत बेचारों की!

स्वतंत्रता का भाव लिए जो,
खेला करती थी उन गलियों में,
पत्थर सी मुरझा गई वो,
एक दरिंदे की रंगरलियों में.

जबरन उठा उस मासूम को उसने,
अपने हवस का शिकार बनाया था
कहां गई थी इंसानियत उसकी?
दया और करुणा को कहां बेंच खाया था?

ठीक ऐसे ही एक बकरी भी थी,
जो मां थी एक प्यारे मेमने की,
रहती थी खुशहाल हमेशा,
मेमने को प्यार देती-दुलारती.

वह दरिंदा एक दिन फ़िर से आया,
और उस मां को उसने उठा लिया,
तड़पा-तड़पा के मारा उसको,
बेचारे मेमने को अनाथ बना दिया.

स्वाद हवस के इस खेल में वो,
एक पापी हैवान बन बैठा,
बुद्धि खोई, करुणा खोया,
और एक पागल शैतान बन बैठा.

तुम तो कुछ करुणा लाओ,
हृदय में दया की गंगा बहाओ,
प्रेम के सागर में डुबकी लगा लो,
एक प्यारा सा इंसान बन जाओ.

Tuesday, 22 September 2015

अस्तित्व की तलाश करता एक व्यर्थ प्राणी

हे प्रकृति, तू क्यों अस्तित्व में आई?
क्यों तूने हमें अस्तित्व में लाया?
क्यों तूने हम में भावनाएं भर दीं?

मेरा अस्तित्व तो बस क्षणिक है
तो मेरे व्यक्तित्व को क्यों बनाया?
क्यों तूने मुझे 'मैं' वाले गुण दिए?
क्यों तूने मुझमें प्रेम, दया और करुणा दिया?
क्यों तूने मुझमें हिंसा, दु:ख और पीड़ा दी?
क्यों तूने मुझे स्वप्न दिए, ख्वाब दिए?
क्यों तूने ये भावनात्मक रिश्ते दिए?

न मैं रहूंगा, न मेरा अस्तित्व,
न ये प्रजाति रहेगी और न इसका अस्तित्व,
न ये ब्रह्मांड रहेगा और न इसका अस्तित्व,
ये समय भला है क्या चीज़?
जिसमें सब कुछ बंधा है पर कुछ भी नहीं.

इस व्यर्थ जगत का क्या प्रयोजन?
यहां जीवन का क्या प्रयोजन?
क्यों मुझे व्यर्थ में जीवन देकर
असहाय, अकेला, अपने अस्तित्व से बेखबर
मुझे उत्पन्न कर यहां छोड़ दिया गया???

~ एक जिज्ञासु, व्यर्थ प्राणी

Thursday, 20 August 2015

मैं थम सा गया

गौधूलिया के पहर में मैं
गुजरा साइकिल पर वहां से
एक दिलकश आवाज़ से
मैं थम सा गया.

तीक्ष्ण आवाज़ झींगुरों की
खामोशी पर तीर सा प्रहार करती,
उल्लुओं की दुर्लभ आवाज़ के साथ
मोर की सुदूर से आती आवाज़ को लेकर
मेरे कानों में आनंद का रस घोलतीं
मुझे पुकारीं, और मैं
मैं थम सा गया.

सूरज की आखिरी कुछ किरणें
अंधेरे से अपने अस्तित्व के लिए लड़ती हुई
एक ठंडे अहसास से भरे वातावरण में
शांत खड़े घने वृक्ष-पौधे
मुझे आकर्षित करते, सम्मोहित करते
मैं थम सा गया.

हृदय बार-बार यही कहता है
कि उसे हमेशा इसी पल में रहना है
मैं दिल को सांत्वना देता-सोचता
कब! न जाने कब……!

Wednesday, 1 July 2015

मैं हूं ही नहीं!


मैं चल रहा हूं,
मैं क्यों चल रहा हूं?
क्या हूं मैं…
एक मिट्टी का शरीर!
मिट्टी पर चलता हुआ,
मैं चलता हुआ मिट्टी हूं!

मैं सोच रहा हूं,
मैं क्यों सोच रहा हूं?
क्या है ये सोच-समझ...
एक रासायनिक अभिक्रिया!
रसायनों में होती हुई
मेरी सोच-समझ तो एक
रासायनिक उथल-पुथल है!

क्या अंतर है?
मुझमें और धरती में...
कोई नहीं
वो भी मिट्टी, मैं भी मिट्टी!
मैं भी धरती हूं,
मैं ब्रह्मांड हूं
ब्रह्मांड अनंत है,
मैं अनंत हूं.
ब्रह्मांड शून्य है,
मैं हूं ही नहीं!

Monday, 25 May 2015

प्रेम महसूस कीजिए

आप मांसाहारी हैं,
आप मांस खाना चाहते हैं!
उन तड़पते जानवरों की पीड़ा का
क्या आपको अनुभव नहीं होता?

आप उन मासूमों को
बेरहमी से मारे जाते देखते हैं,
क्या आप कांप नहीं उठते?
क्या आपको वह कृत्य सामान्य लगता है?

आप उन्हें पिंजरों में कैद देखते हैं,
आप उन्हें पीड़ा से फड़फड़ाते देखते हैं,
क्या आपको उन पर तरस नहीं आता?
क्या आपको उनका दु:ख नहीं दिखता?

जब आप मांस खाते हैं,
जब आप एक मृत शरीर खाते हैं...
तो क्या उस जानवर का चेहरा,
पीड़ा से कांपता, आपको डराता नहीं?

आप के पास आहिंसा का रास्ता है,
आपके पास प्रेम और शांति का रास्ता है,
क्या है जो आपको खूनी बनाता है?
क्या आपका दिल पत्थर का है?

उनकी चीख-पुकार-वेदना,
उनका दु:ख-दर्द देखिए...
उन्हें प्यार और मदद चाहिए
क्या प्रेम आपको आवाज़ नहीं देता?

Friday, 22 May 2015

साफ़ पानी का कछुआ (Terrapin)

मीठे पानी का वासी है,
नदी-तालाब है इसका ठिकाना;
सरीसृप वर्ग का प्राणी है,
वनस्पति व मृत जीव हैं इसका खाना.

मृत अवशेषों को खाकर ये,
करता है नदी-तालाब की सफ़ाई;
प्रकृति का अनमोल रक्षक है,
उम्र इसने बहुत लंबी है पाई.

सुबह-शाम को क्रियाशील होता,
दिन में ये सेंकता धूप;
पत्थर सा शरीर है इसका,
जो करता इसकी रक्षा खूब.

नदी किनारे गड्ढा खोदकर,
मादा अंडे देकर ढक देती;
दो महीने में वो परिपक्व होते,
फ़िर उनकी ज़िंदगी शुरू होती.

अवैध शिकार ने इन मासूमों के,
अस्तित्व को खतरे में डाल दिया;
नदी-तालाब हैं मरने लगे,
जब कछुओं को नदी से जुदा किया.

बहुत ज़रूरत है इनके संरक्षण की,
यदि नदी-तालाब हमको है बचाना;
इनके शिकार को रोकने के साथ ही,
इनके पर्यावास को भी हानि न पहुंचाना.

Photo Credit : TSA India.

Monday, 18 May 2015

प्यासे पंक्षी, प्यासी धरती

सूख गए सब ताल-तलैया,
कहीं नहीं है पानी भैया।
तृष्णा से है व्याकुल धरती,
भटक रहे सब प्राणी-चिरैया।।

शहर का तो हाल बुरा है,
चारों ओर कंक्रीट जमा है।
पग-पग प्यासे भटक रहे हैं,
बिन पानी सब तड़प रहे हैं।।

मानव तो नल से लेता पानी,
पर प्राणियों की है अलग कहानी।
पट गए सारे कुंए-ताल,
हो गया उनका हाल-बेहाल।।

आप ज़रा सा कष्ट उठाओ,
एक पानी का पात्र ले आओ।
दरवाज़े के बाहर रख दो,
और उसको पानी से भर दो।।

पंक्षी जब पानी पायेंगे,
आप की खातिर गीत गाएंगे।
गाय की जब प्यास बुझेगी
धरती भी हर्षित हो उठेगी।।

Friday, 15 May 2015

वो कुत्ता दूसरे छत पर

वो कुत्ता
दूसरे छत पर
भौंकता हुआ
न जाने क्यूँ?
अंधेरी रात में,
तारों से भरे आकाश के नीचे...
फैला सन्नाटा टूटता हुआ
उस आवाज से
जो मुझसे मेरी शांति छीन रही
ककर्ष आवाज़..........करुण आवाज़
उस कुत्ते की!
पहले तो वह आवाज़ चुभी पर...
फिर, उस नादान
जंजीरों में जकड़े
निरीह पशु की करुण वेदना
सी प्रतीत हुई।
वो पशु...
जिसे जंजीरों में बंधा चौकीदार बना दिया
ठंड-गरम बरसात हर हाल में
खुले आकाश तले
इंसानी चोरों से इंसानी मालिकों की
चौकीदारी करता
न जाने कौनसा एहसान चुका रहा!
उस काकर्श आवाज़ में,
वो करुण वेदना
मानो....उस पशु के,
मुख से निकालने वाले आँसू हों।
वो अकेला
अजीब सी तन्हाई में
सिर्फ प्रकृति की खामोशी
मानो उसकी दोस्त है।

Wednesday, 13 May 2015

न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

जीवन के अनमोल 6 वर्ष न्योछावर कर
चेतना की उम्र में जड़ का अध्ययन कर
IT व इलेक्ट्रॉनिक्स का लेकर ज्ञान
अचंभे में हूँ मैं जैसे हूँ अज्ञान 
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

विश्व को है सुधार की आवश्यकता
प्रकृति को है उपचार की आवश्यकता
विज्ञान को है विचार की आवश्यकता
मुझको पर नहीं है उस कार्य की आवश्यकता 
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

न सीखा मैंने सामाजिक ज्ञान
न जाना मैंने संसार का विधान
कुछ कल-पुर्जों में सिमट गया मैं
अपने जीवन से भटक गया मैं
पता नहीं... 
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

विश्व को लड़ते-झगड़ते देखा
पर्यावरण को सड़ते देखा
जीव-जंतुओं को मरते देखा
क्यों नहीं लिया मैंने इसका ज्ञान?
सोचता हूँ... 
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

उन वर्षों में शोषण हुआ
कॉलेज में जेल हुई, कुपोषण हुआ
निरर्थक था वो औद्दोगिक ज्ञान
आध्यात्म के नेत्रों से देखा तो
आभास हुआ...
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

पूंजीवादी दुनिया में ज्ञान
स्वरूप बदल कर हो गया बेईमान
सिर्फ सिखाया पैसे कमाना... 
छूट गया, मानव ज्ञान का खजाना
विचार किया...
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की! 

Tuesday, 3 March 2015

फागुन के रंग

रंगों का है मौसम आया,
पर इक जरूरी बात है भाया.
रासायनिक रंगों का इस्तेमाल न करना,
हर्बल रंग में ही रंगना.
और इक खास बात का रखना ध्यान,
कि कोई जानवर न हो परेशान.
रंग उन्हें कभी मत लगाना,
खुजली-जलन से उन्हें है बचाना.
और पानी भी न करना बर्बाद,
क्यूंकि उसी से धरती पर है जीवन आबाद.
धरती के संग होली मनाओ,
फागुन के सुहाने गीत गाओ.

Tuesday, 17 February 2015

महाशिवरात्रि

एक बेचारी गाय ने अपने स्तन में,
नवजात बछड़े के खातिर दूध बनाया,
तभी एक इंसान ने आकर,
उसका पूरा दूध चुराया.

लोटा भरके उस दूध को उसने,
पत्थर को नहला दिया,
नाली में बहता वो दूध,
एक मां(गाय) को उसने रुला दिया.

Wednesday, 11 February 2015

मेरी प्यारी फरवरी

देखो तो कैसी ऋतु है आई,
न है गर्मी और न ठंड की कंपकंपाई;
दिन हो गया ऐसा सुहाना,
कि मन न करे इसका जाना।

सुबह-सुबह जब मैंने ली अंगड़ाई,
कानों में मेरे बुलबुल की आवाज़ आई;
सूरज की मध्यम किरणों का सवेरा,
नीला आकाश और हवाओं का फेरा।

गावों में तो जैसे जन्नत है आई,
सरसों-गेहूं की फसल यूं लहलहाई;
बहते हुए जल ने उसको निखेरा,
पतझड़ ने पेड़ों की कला को उकेरा।

दोपहर में जब चारों ओर चिड़ियाँ चहचहाईं,
प्रकृति ने बसंत की बंसी बजाई;
गोरैया, कबूतर, मैना ने गीत गाया,
और बैब्लर ने जमकर शोर मचाया।

छतों पे उड़ते-घूमते कबूतरों का जोड़ा,
दूर ऊपर आकाश में चीलों का डेरा;
सदाबहार वृक्ष भी नाच रहे हैं,
छोटी घासें धरती से झांक रही हैं।

खेतों में है ढेरों सब्जियों का पिटारा,
है धरती का दिया उपहार हमारा;
प्रेम, कला और त्याग की ये ऋतु है हमारी,
फरवरी है मुझको सबसे प्यारी।

डर है कि ये ऋतु चली जाएगी,
धरती की मुस्कान कम हो जाएगी;
इसलिए दिन-रात इस ऋतु को जी रहा हूं,
माँ प्रकृति के इस अमृत को पी रहा हूं।