Wednesday, 11 February 2015

मेरी प्यारी फरवरी

देखो तो कैसी ऋतु है आई,
न है गर्मी और न ठंड की कंपकंपाई;
दिन हो गया ऐसा सुहाना,
कि मन न करे इसका जाना।

सुबह-सुबह जब मैंने ली अंगड़ाई,
कानों में मेरे बुलबुल की आवाज़ आई;
सूरज की मध्यम किरणों का सवेरा,
नीला आकाश और हवाओं का फेरा।

गावों में तो जैसे जन्नत है आई,
सरसों-गेहूं की फसल यूं लहलहाई;
बहते हुए जल ने उसको निखेरा,
पतझड़ ने पेड़ों की कला को उकेरा।

दोपहर में जब चारों ओर चिड़ियाँ चहचहाईं,
प्रकृति ने बसंत की बंसी बजाई;
गोरैया, कबूतर, मैना ने गीत गाया,
और बैब्लर ने जमकर शोर मचाया।

छतों पे उड़ते-घूमते कबूतरों का जोड़ा,
दूर ऊपर आकाश में चीलों का डेरा;
सदाबहार वृक्ष भी नाच रहे हैं,
छोटी घासें धरती से झांक रही हैं।

खेतों में है ढेरों सब्जियों का पिटारा,
है धरती का दिया उपहार हमारा;
प्रेम, कला और त्याग की ये ऋतु है हमारी,
फरवरी है मुझको सबसे प्यारी।

डर है कि ये ऋतु चली जाएगी,
धरती की मुस्कान कम हो जाएगी;
इसलिए दिन-रात इस ऋतु को जी रहा हूं,
माँ प्रकृति के इस अमृत को पी रहा हूं।

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