Monday, 25 May 2015

प्रेम महसूस कीजिए

आप मांसाहारी हैं,
आप मांस खाना चाहते हैं!
उन तड़पते जानवरों की पीड़ा का
क्या आपको अनुभव नहीं होता?

आप उन मासूमों को
बेरहमी से मारे जाते देखते हैं,
क्या आप कांप नहीं उठते?
क्या आपको वह कृत्य सामान्य लगता है?

आप उन्हें पिंजरों में कैद देखते हैं,
आप उन्हें पीड़ा से फड़फड़ाते देखते हैं,
क्या आपको उन पर तरस नहीं आता?
क्या आपको उनका दु:ख नहीं दिखता?

जब आप मांस खाते हैं,
जब आप एक मृत शरीर खाते हैं...
तो क्या उस जानवर का चेहरा,
पीड़ा से कांपता, आपको डराता नहीं?

आप के पास आहिंसा का रास्ता है,
आपके पास प्रेम और शांति का रास्ता है,
क्या है जो आपको खूनी बनाता है?
क्या आपका दिल पत्थर का है?

उनकी चीख-पुकार-वेदना,
उनका दु:ख-दर्द देखिए...
उन्हें प्यार और मदद चाहिए
क्या प्रेम आपको आवाज़ नहीं देता?

Friday, 22 May 2015

साफ़ पानी का कछुआ (Terrapin)

मीठे पानी का वासी है,
नदी-तालाब है इसका ठिकाना;
सरीसृप वर्ग का प्राणी है,
वनस्पति व मृत जीव हैं इसका खाना.

मृत अवशेषों को खाकर ये,
करता है नदी-तालाब की सफ़ाई;
प्रकृति का अनमोल रक्षक है,
उम्र इसने बहुत लंबी है पाई.

सुबह-शाम को क्रियाशील होता,
दिन में ये सेंकता धूप;
पत्थर सा शरीर है इसका,
जो करता इसकी रक्षा खूब.

नदी किनारे गड्ढा खोदकर,
मादा अंडे देकर ढक देती;
दो महीने में वो परिपक्व होते,
फ़िर उनकी ज़िंदगी शुरू होती.

अवैध शिकार ने इन मासूमों के,
अस्तित्व को खतरे में डाल दिया;
नदी-तालाब हैं मरने लगे,
जब कछुओं को नदी से जुदा किया.

बहुत ज़रूरत है इनके संरक्षण की,
यदि नदी-तालाब हमको है बचाना;
इनके शिकार को रोकने के साथ ही,
इनके पर्यावास को भी हानि न पहुंचाना.

Photo Credit : TSA India.

Monday, 18 May 2015

प्यासे पंक्षी, प्यासी धरती

सूख गए सब ताल-तलैया,
कहीं नहीं है पानी भैया।
तृष्णा से है व्याकुल धरती,
भटक रहे सब प्राणी-चिरैया।।

शहर का तो हाल बुरा है,
चारों ओर कंक्रीट जमा है।
पग-पग प्यासे भटक रहे हैं,
बिन पानी सब तड़प रहे हैं।।

मानव तो नल से लेता पानी,
पर प्राणियों की है अलग कहानी।
पट गए सारे कुंए-ताल,
हो गया उनका हाल-बेहाल।।

आप ज़रा सा कष्ट उठाओ,
एक पानी का पात्र ले आओ।
दरवाज़े के बाहर रख दो,
और उसको पानी से भर दो।।

पंक्षी जब पानी पायेंगे,
आप की खातिर गीत गाएंगे।
गाय की जब प्यास बुझेगी
धरती भी हर्षित हो उठेगी।।

Friday, 15 May 2015

वो कुत्ता दूसरे छत पर

वो कुत्ता
दूसरे छत पर
भौंकता हुआ
न जाने क्यूँ?
अंधेरी रात में,
तारों से भरे आकाश के नीचे...
फैला सन्नाटा टूटता हुआ
उस आवाज से
जो मुझसे मेरी शांति छीन रही
ककर्ष आवाज़..........करुण आवाज़
उस कुत्ते की!
पहले तो वह आवाज़ चुभी पर...
फिर, उस नादान
जंजीरों में जकड़े
निरीह पशु की करुण वेदना
सी प्रतीत हुई।
वो पशु...
जिसे जंजीरों में बंधा चौकीदार बना दिया
ठंड-गरम बरसात हर हाल में
खुले आकाश तले
इंसानी चोरों से इंसानी मालिकों की
चौकीदारी करता
न जाने कौनसा एहसान चुका रहा!
उस काकर्श आवाज़ में,
वो करुण वेदना
मानो....उस पशु के,
मुख से निकालने वाले आँसू हों।
वो अकेला
अजीब सी तन्हाई में
सिर्फ प्रकृति की खामोशी
मानो उसकी दोस्त है।

Wednesday, 13 May 2015

न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

जीवन के अनमोल 6 वर्ष न्योछावर कर
चेतना की उम्र में जड़ का अध्ययन कर
IT व इलेक्ट्रॉनिक्स का लेकर ज्ञान
अचंभे में हूँ मैं जैसे हूँ अज्ञान 
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

विश्व को है सुधार की आवश्यकता
प्रकृति को है उपचार की आवश्यकता
विज्ञान को है विचार की आवश्यकता
मुझको पर नहीं है उस कार्य की आवश्यकता 
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

न सीखा मैंने सामाजिक ज्ञान
न जाना मैंने संसार का विधान
कुछ कल-पुर्जों में सिमट गया मैं
अपने जीवन से भटक गया मैं
पता नहीं... 
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

विश्व को लड़ते-झगड़ते देखा
पर्यावरण को सड़ते देखा
जीव-जंतुओं को मरते देखा
क्यों नहीं लिया मैंने इसका ज्ञान?
सोचता हूँ... 
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

उन वर्षों में शोषण हुआ
कॉलेज में जेल हुई, कुपोषण हुआ
निरर्थक था वो औद्दोगिक ज्ञान
आध्यात्म के नेत्रों से देखा तो
आभास हुआ...
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!

पूंजीवादी दुनिया में ज्ञान
स्वरूप बदल कर हो गया बेईमान
सिर्फ सिखाया पैसे कमाना... 
छूट गया, मानव ज्ञान का खजाना
विचार किया...
न जाने क्यूँ मैंने इंजीनियरिंग की!