Friday, 20 October 2023

अक्टूबर में एक ग़ांव

 घर के बगल तालाब 

तालाब के किनारे घास

घास पर ओस की चादर

ओस की चादर पर नाचती सुबह की किरणें

गुलाबी सर्द मौसम

नींबू वाली चाय की चुस्कियां

गेंदे के फुलवारी की महक

लंबी सांस, अहा ! 


थोड़ा ख्वाब, थोड़ी हकीकत 😊

Thursday, 4 November 2021

 त्योहारों के उस मौसम में,

दिवाली का दिन आया था। 

डरा-सहमा सा बैठा था वो,

भला किसने ये आतंक मचाया था?


जब भी दगते बम-पटाखे,

वो रोता-चीखता घबराता था

हर आवाज़ थी चुभती उसको 

वो कोने में दुबक जाता था। 


ये कैसा त्योहार वो मनाते हैं

जो बेज़ुबान जीवों को डराता हो,

ये कैसा शौक वो दिखाते हैं

जो उन्हें भयभीत करता, रुलाता हो!


तबाही उस रात ही खत्म नहीं हुई 

अब वायु-प्रदूषण के असर की बारी थी,

कुछ का लगा जी मचलाने तो,

किसीको खुजली-जलन आदि बीमारी थी। 


पटाखों के बारूद के जहर से,

सारे जल स्रोत प्रदूषित हो गए,

और वो जल पीकर जानवर

रोगों-व्याधिओं से शोषित हो गए। 


आइये मनाएँ शुभ दीपावली

अशुभ पटाखों का त्याग करें हम,

करें जीव-इन्सानों की सेवा

जिम्मेदार प्राणी, यानी इंसान बनें हम। 


 (Poem 'Meri Kriti' - Abhishek Dubey Green)

Wednesday, 6 November 2019

दिक्कत तो सिर्फ इंसान में है

न दिक्कत धर्म में है,
न दिक्कत विज्ञान में है,
धर्म के नाम पर भी गलत कार्य होते हैं,
विज्ञान पढ़कर भी लोग प्रकृति को तबाह करते हैं।
दिक्कत न तो अल्लाह में है और न भगवान में है,
दिक्कत तो सिर्फ इंसान में है।

Thursday, 19 September 2019

मानव बनाम धरती

इंसानों ने कब्जा कर लिया
धरती को चहुं ओर
पशु-पक्षी हैं भटक रहे
ठिकाना नहीं किसी छोर

जंगल और घास के मैदान
काटा और जलाया
रेगिस्तान, पर्वत-पठार
को भी शहर बनाया

नदी, तालाब और समुद्र
प्रदूषण से गंधाए
पेड़-पौधे और झाड़ियां
विकास की भेंट चढ़ाए

बचे-खुचे जंगल में से जब
कोई भूखा प्राणी बाहर आए
कह नरभक्षी उसको तुम
मौत की सज़ा सुनाए

गाय,भैंस, बकरी, मुर्गी को
लालच में खूब बढ़ाया
बेऔक़ात होकर गौवंश को
खेत-सड़क में छुड़वाया

कहकर आवारा जानवर उनको
चाचाजी तिलमिलाए
और फिर पूरा दोष
सरकार के मत्थे चढ़ाए

नीलगाय, बंदर, सुअर की जमीन
कब्जा करके बोले
ये सब है विनाशक पशु
कोई इनको मारे खा ले

बिना पर्यावास, भोजन, पानी के
प्रजातियों को विलुप्त कराए
जैवतंत्र को असुंतलित करके
जीवन को मिटवाए

प्रदूषण से धरती पर
तापमान गरमाया
जलवायु होने लगी परिवर्तित
जल-भोजन का संकट है आया

धरती पहुंची खतरे में
जलवायु-जैवतंत्र का आपातकाल आया
वैज्ञानिक-कार्यकर्ता रहे चिल्लाते
पर किसी ने लालच नहीं हटाया

जीवन का अब मिटना तय है
यदि मानवता खतरे को समझ न पाई
अब ज्यादा समय नहीं बचा है
अब तो जाग जाओ भाई

Thursday, 17 January 2019

बर्बाद कर दो धरती को

खूब करो इच्छाएं
और बर्बाद कर दो धरती को
जी हां...

पहले इच्छाओं की पूर्ति के लिए रूपए कमाओ
रूपए आते कहां से हैं
अंतत: प्रकृति का दोहन करने वाले उद्यम से ही तो...
तो प्रकृति को लूटकर रूपए कमाओ
और फिर
अपनी इच्छाओं को खरीदो
इच्छाएं भी तो प्रकृति से खिलवाड़ कर के ही तो पूरी होती हैं
आप कोई सामान चाहें, या व्यंजन या मनोरंजन...
तो इस प्रकार आप खूब इच्छाएं करो
अरबों लोग ऐसे ही इच्छाएं करें...
और निगल जाएं पूरी धरती को
जानवरों, जंगल, जमीन समेत .

Thursday, 20 December 2018

चम्मच

तुमको चाहिए था एक चम्मच,
तो आविष्कार हुआ चम्मच का
तुम्हारे लिए...
और सब बर्बाद हो गया
कैसे ?

पहले ढूंढा गया कच्चा लोहा
एक जंगल के तले
जंगल उजाड़ दिया, जानवरों को मार दिया
और खोद दी धरती
निकाला कच्चा लोहा
जिससे बनाना था स्टील.

लोहे को जलाने को जरूरत थी
अत्यधिक गर्मी की
और उसके लिए चाहिए था कोयला
जो दबा था एक और जंगल तले

उस जंगल का भी वही हुआ
और निकाला गया, कोयला
फिर बनाया गया शुद्घ लोहा
जिसे दूसरे संयंत्र में फिर कोयला जलाकर
बनाया गया स्टील

फिर एक और कारखाने में
फिर से कोयला जलाकर
बनाया गया चम्मच
व फिर
सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर
तुम्हारे बाजार में आया चम्मच
जो तुमने दो रूपए का खरीदा
और सभ्य लोगों की तरह
भोजन किया.

Thursday, 1 March 2018

आसान जीवन

जिंदगी कभी भार नहीं बनती
रिश्ते-नाते भार होते हैं
तोड़ दो उन्हें
आज़ाद कर दो खुद को
बंधनों से,
जीवन कितना खूबसूरत है
प्रकृति, कला, साहित्य, संगीत में
अनंत की ओर झांकने में
ऐसे जीवंत लोगों से बात करने में
सोने में, जागने में,
चलने में, दौड़ने में,
खाने में, पीने में,
जीने में, मरने में...
जीवन तो जन्नत है.
कितना आसान है जीना
बस किनारे करो बंधनों को
और चुन लो जीवन को!

मेरी कृति - अभिषेक (01-03-18, 11 PM)₹ww