घर के बगल तालाब
तालाब के किनारे घास
घास पर ओस की चादर
ओस की चादर पर नाचती सुबह की किरणें
गुलाबी सर्द मौसम
नींबू वाली चाय की चुस्कियां
गेंदे के फुलवारी की महक
लंबी सांस, अहा !
थोड़ा ख्वाब, थोड़ी हकीकत 😊
In this blog, i am going to share my 'KRITI' as poems and stories.
घर के बगल तालाब
तालाब के किनारे घास
घास पर ओस की चादर
ओस की चादर पर नाचती सुबह की किरणें
गुलाबी सर्द मौसम
नींबू वाली चाय की चुस्कियां
गेंदे के फुलवारी की महक
लंबी सांस, अहा !
थोड़ा ख्वाब, थोड़ी हकीकत 😊
त्योहारों के उस मौसम में,
दिवाली का दिन आया था।
डरा-सहमा सा बैठा था वो,
भला किसने ये आतंक मचाया था?
जब भी दगते बम-पटाखे,
वो रोता-चीखता घबराता था
हर आवाज़ थी चुभती उसको
वो कोने में दुबक जाता था।
ये कैसा त्योहार वो मनाते हैं
जो बेज़ुबान जीवों को डराता हो,
ये कैसा शौक वो दिखाते हैं
जो उन्हें भयभीत करता, रुलाता हो!
तबाही उस रात ही खत्म नहीं हुई
अब वायु-प्रदूषण के असर की बारी थी,
कुछ का लगा जी मचलाने तो,
किसीको खुजली-जलन आदि बीमारी थी।
पटाखों के बारूद के जहर से,
सारे जल स्रोत प्रदूषित हो गए,
और वो जल पीकर जानवर
रोगों-व्याधिओं से शोषित हो गए।
आइये मनाएँ शुभ दीपावली
अशुभ पटाखों का त्याग करें हम,
करें जीव-इन्सानों की सेवा
जिम्मेदार प्राणी, यानी इंसान बनें हम।
(Poem 'Meri Kriti' - Abhishek Dubey Green)