Thursday, 20 August 2015

मैं थम सा गया

गौधूलिया के पहर में मैं
गुजरा साइकिल पर वहां से
एक दिलकश आवाज़ से
मैं थम सा गया.

तीक्ष्ण आवाज़ झींगुरों की
खामोशी पर तीर सा प्रहार करती,
उल्लुओं की दुर्लभ आवाज़ के साथ
मोर की सुदूर से आती आवाज़ को लेकर
मेरे कानों में आनंद का रस घोलतीं
मुझे पुकारीं, और मैं
मैं थम सा गया.

सूरज की आखिरी कुछ किरणें
अंधेरे से अपने अस्तित्व के लिए लड़ती हुई
एक ठंडे अहसास से भरे वातावरण में
शांत खड़े घने वृक्ष-पौधे
मुझे आकर्षित करते, सम्मोहित करते
मैं थम सा गया.

हृदय बार-बार यही कहता है
कि उसे हमेशा इसी पल में रहना है
मैं दिल को सांत्वना देता-सोचता
कब! न जाने कब……!