Tuesday, 22 September 2015

अस्तित्व की तलाश करता एक व्यर्थ प्राणी

हे प्रकृति, तू क्यों अस्तित्व में आई?
क्यों तूने हमें अस्तित्व में लाया?
क्यों तूने हम में भावनाएं भर दीं?

मेरा अस्तित्व तो बस क्षणिक है
तो मेरे व्यक्तित्व को क्यों बनाया?
क्यों तूने मुझे 'मैं' वाले गुण दिए?
क्यों तूने मुझमें प्रेम, दया और करुणा दिया?
क्यों तूने मुझमें हिंसा, दु:ख और पीड़ा दी?
क्यों तूने मुझे स्वप्न दिए, ख्वाब दिए?
क्यों तूने ये भावनात्मक रिश्ते दिए?

न मैं रहूंगा, न मेरा अस्तित्व,
न ये प्रजाति रहेगी और न इसका अस्तित्व,
न ये ब्रह्मांड रहेगा और न इसका अस्तित्व,
ये समय भला है क्या चीज़?
जिसमें सब कुछ बंधा है पर कुछ भी नहीं.

इस व्यर्थ जगत का क्या प्रयोजन?
यहां जीवन का क्या प्रयोजन?
क्यों मुझे व्यर्थ में जीवन देकर
असहाय, अकेला, अपने अस्तित्व से बेखबर
मुझे उत्पन्न कर यहां छोड़ दिया गया???

~ एक जिज्ञासु, व्यर्थ प्राणी

2 comments:

  1. Bahot badhiya Abhishek.

    Yeh dukhad ki baat hai ki hamara astitva mein aana bahot hi dukhdaayi bhara safar hai.

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  2. यदि हम पृथ्वी पर आने का पर्याय समझ ही जाएंगे तो, यह मृत्यु लोक नही रह जायेगा मित्र।

    अनुपम लेख

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