Sunday, 28 December 2014

और कहते हैं मां है ये

रस्सी में जकड़ के रखा, पूरी ज़िंदगी पकड़ के रखा,
मीलों तक जो चलते थे, उनको रखा बाड़े में। 
और कहते हैं..........माँ है ये!

हर वर्ष जबरन गर्भवती बनाते, जीवन भर ये क्रिया कराते,
दूध की फैक्ट्री बना दिया है, देखो कैसा सिला दिया है। 
और कहते हैं..........माँ है ये!

पैदा हुए नवजात बछड़े का, दूध लेते हैं छीन,
और उसको देते सूखा भूसा, गाय रोती हो गमगीन। 
और कहते हैं..........माँ है ये!

बछड़े को माँ से अलग कराते, ज़ुल्म करते कहर हैं ढाते,
दासता का जीवन देकर, खुद को गो-प्रेमी कहलवाते। 
और कहते हैं..........माँ है ये!

बड़े हुए बछड़े को बेंचते, जो जाते सीधे कसाईखाने में,
बूढ़ी हुई गाय भी बिकती, जो जातीं उसी ठिकाने मैं। 
और कहते हैं..........माँ है ये!

नवजात शिशु के हिस्से के दूध का, यहाँ पर व्यापार लगा है,
मुस्टंडे और बूढ़े हैं पीते, वेश्यीपन का बाज़ार लगा है। 
और कहते हैं..........माँ है ये!

दूसरी माँ के स्तन के दूध को, छीनने का किसने अधिकार दिया है,
अपना स्वार्थ सिद्ध करते हो, देखो यहाँ बलात्कार हुआ है। 
और कहते हैं..........माँ है ये!

Monday, 15 December 2014

बुद्ध अगर तुम न बन सको तो, लादेन तो न बनो मगर तुम

खून को नस में ही बहने दो,
नाली में ना फेंको तुम;
मांस को शरीर में बसने दो,
आग में ना सेंको तुम.

बच्चों को मां से ना छीनो,
न छीनो मां को बच्चों से;
संग-संग सबको रहने दो,
मत अलग करो इक-दूजे को तुम.

न दर्द उन्हें दो, न ही मारो,
जीवन उनका मत छीनो तुम;
वही खून है, वही दर्द है,
इसको ज़रा महसूस करो तुम.

दु:ख अगर उनका दूर न कर सको,
सुख अगर उनको न दे सको तुम;
रहने दो बस उनको स्वतंत्र,
बिल्कुल भी न छेडो उनको तुम.

Friday, 12 December 2014

एक कूड़ेदान की व्यथा

बड़े ही गर्व के साथ मैं
रखा गया एक सड़क किनारे,
चमचमाता हुआ
एक सभ्यता का प्रतीक बना.

बहुत ही आशा थी कि,
बनुंगा मैं धरती का रक्षक…
मिटाउंगा गंदगी
और भेजुंगा कूड़े को किसी गड्ढे तक.

जब मैं नया-नया आया था,
लोगों ने कूड़े से मुझे तृप्त कराया था…
पर फ़िर मुझसे
कूड़े को,
कोई निकालने ना आया
और मैं जैसे,
अपने ही शरीर की गंदगी से
सड़ता गया, उपेक्षित हुआ.

चंद ही दिनों में मैं भी
कूड़ें के साथ कूड़ा हो गया…
स्वयं को कूड़ा बना देखता रहा मैं,
और स्वच्छता का सपना अघूरा रह गया!

Tuesday, 29 April 2014

जब धरती निर्जन सी नज़र आती है...

ढलती हुई शाम,
खेतों में दूर-दूर तक फैली खामोशी,
वीरानापन...
थमे खड़े पेड़,
जमीन पर तैरता कुहासा,
और इस
मौत के समान मौन वातावरण में,
धरती निर्जन सी नज़र आती है।

आकाश में निकले कुछ तारे,
दूर कहीं हल्की रोशनी,
धरती की गरमाहट भरी महक,
मैंने महसूस किया...
इन पलों ने पूरी घटना को
मुझमें प्रवाहित कर इसे
मेरी कविता के शब्द बना दिए!
जिनमें मुझे...
धरती निर्जन सी नज़र आती है।

धरती हमेशा जीवित नहीं रहती,
इस पल में...
पशु-पक्षी, मानव सभी मानो विलुपता हो गए;
ये जगह ऐसी लगती है कि
जैसे यहाँ कभी कोई आया ही न हो।
अगर कुछ जीवित लगता है...
तो वो है बहता हुआ पानी
मानो केवल वही ज़िंदा हो!
पर चारों तरफ फैली इस मायूसी में,
धरती निर्जन सी नज़र आती है।

धरती हमेशा हँसती-खेलती नहीं,
वृक्ष हमेशा घूमते नहीं,
जीव-जन्तु हमेशा विचरण नहीं करते,
आवाजों से भरा वातावरण कभी
खामोश हो जाता है...
और इस पल यहाँ
गम जैसा दु:ख भरा माहोल छाता है
और...
धरती निर्जन सी नज़र आती है।।