Tuesday, 17 February 2015

महाशिवरात्रि

एक बेचारी गाय ने अपने स्तन में,
नवजात बछड़े के खातिर दूध बनाया,
तभी एक इंसान ने आकर,
उसका पूरा दूध चुराया.

लोटा भरके उस दूध को उसने,
पत्थर को नहला दिया,
नाली में बहता वो दूध,
एक मां(गाय) को उसने रुला दिया.

Wednesday, 11 February 2015

मेरी प्यारी फरवरी

देखो तो कैसी ऋतु है आई,
न है गर्मी और न ठंड की कंपकंपाई;
दिन हो गया ऐसा सुहाना,
कि मन न करे इसका जाना।

सुबह-सुबह जब मैंने ली अंगड़ाई,
कानों में मेरे बुलबुल की आवाज़ आई;
सूरज की मध्यम किरणों का सवेरा,
नीला आकाश और हवाओं का फेरा।

गावों में तो जैसे जन्नत है आई,
सरसों-गेहूं की फसल यूं लहलहाई;
बहते हुए जल ने उसको निखेरा,
पतझड़ ने पेड़ों की कला को उकेरा।

दोपहर में जब चारों ओर चिड़ियाँ चहचहाईं,
प्रकृति ने बसंत की बंसी बजाई;
गोरैया, कबूतर, मैना ने गीत गाया,
और बैब्लर ने जमकर शोर मचाया।

छतों पे उड़ते-घूमते कबूतरों का जोड़ा,
दूर ऊपर आकाश में चीलों का डेरा;
सदाबहार वृक्ष भी नाच रहे हैं,
छोटी घासें धरती से झांक रही हैं।

खेतों में है ढेरों सब्जियों का पिटारा,
है धरती का दिया उपहार हमारा;
प्रेम, कला और त्याग की ये ऋतु है हमारी,
फरवरी है मुझको सबसे प्यारी।

डर है कि ये ऋतु चली जाएगी,
धरती की मुस्कान कम हो जाएगी;
इसलिए दिन-रात इस ऋतु को जी रहा हूं,
माँ प्रकृति के इस अमृत को पी रहा हूं।