Saturday, 17 October 2015

दरिंदगी के शिकार : वो परिवार

आओ तुमको बात बताउं,
पीड़ित उन परिवारों की
दरिंदगी में कुचले गए,
उन अनगिनत बेचारों की!

स्वतंत्रता का भाव लिए जो,
खेला करती थी उन गलियों में,
पत्थर सी मुरझा गई वो,
एक दरिंदे की रंगरलियों में.

जबरन उठा उस मासूम को उसने,
अपने हवस का शिकार बनाया था
कहां गई थी इंसानियत उसकी?
दया और करुणा को कहां बेंच खाया था?

ठीक ऐसे ही एक बकरी भी थी,
जो मां थी एक प्यारे मेमने की,
रहती थी खुशहाल हमेशा,
मेमने को प्यार देती-दुलारती.

वह दरिंदा एक दिन फ़िर से आया,
और उस मां को उसने उठा लिया,
तड़पा-तड़पा के मारा उसको,
बेचारे मेमने को अनाथ बना दिया.

स्वाद हवस के इस खेल में वो,
एक पापी हैवान बन बैठा,
बुद्धि खोई, करुणा खोया,
और एक पागल शैतान बन बैठा.

तुम तो कुछ करुणा लाओ,
हृदय में दया की गंगा बहाओ,
प्रेम के सागर में डुबकी लगा लो,
एक प्यारा सा इंसान बन जाओ.