Monday, 18 May 2015

प्यासे पंक्षी, प्यासी धरती

सूख गए सब ताल-तलैया,
कहीं नहीं है पानी भैया।
तृष्णा से है व्याकुल धरती,
भटक रहे सब प्राणी-चिरैया।।

शहर का तो हाल बुरा है,
चारों ओर कंक्रीट जमा है।
पग-पग प्यासे भटक रहे हैं,
बिन पानी सब तड़प रहे हैं।।

मानव तो नल से लेता पानी,
पर प्राणियों की है अलग कहानी।
पट गए सारे कुंए-ताल,
हो गया उनका हाल-बेहाल।।

आप ज़रा सा कष्ट उठाओ,
एक पानी का पात्र ले आओ।
दरवाज़े के बाहर रख दो,
और उसको पानी से भर दो।।

पंक्षी जब पानी पायेंगे,
आप की खातिर गीत गाएंगे।
गाय की जब प्यास बुझेगी
धरती भी हर्षित हो उठेगी।।

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