Sunday, 22 April 2012

हवा चल रही है

हवा चल रही है
टकरा कर मुझसे
चाँद आज आया नहीं,
इस रात को रौशनी से भरने.

तारे काले आकाश में
टिमटिमा रहे हैं,
घोर अंधरे में भी
जगमगा रहे हैं.

मुझको छूती हुई ये हवा
कुछ गुनगुना रही है,
अपने शीतल से स्पर्श से
मुझे सहला रही है.

दूर कहीं...
ख़ामोशी तोड़ते हुए,
कुछ जानवर आवाजें निकाल रहे हैं;
पास में भी कुछ झींगुर.
Bachground म्यूजिक बाज़ रहे हैं.

इस अंधरे में न जाने क्यूँ?
मन शांत रहता है;
अजीब पर एक प्यारे एहसास में,
तारों को गिनता, झूमता है.

Sunday, 15 April 2012

और फिर रोना आया...!

न जाने क्यूँ?
मुझे फफक - फफक कर रोना आया,
सांस गले तक आई
और फिर रोना आया.

अच्छा लगा बहुत
रोने में मुझको,
कोशिश की मैंने
और रोने की,
और फिर रोना आया.

पहली बार लगा की
रोने में भी एक ख़ुशी है,
और आँसुओं का क्या,
वो बहने लगे...
और फिर रोना आया.

ख़ुशी इतनी मिली मुझको
रोने में,
की हँसना भी फीका लगा,
और फिर...
और फिर रोना आया.

जी चाहता है रोता रहूँ,
एक अजीब सा एहसास
पीता रहूँ,
हर पल एक ख़ुशी चाह,
और फिर रोना आया.

Thursday, 5 April 2012

झूमूंगा मै

हवा बह रही है, तेज
बदल उमड़ रहे है आकाश में,
चाँद दिख रहा था अभी...
पर अब बादलों में गुम हो गया.

पेड़-पोधे झूम रहे हैं,
बहती हुई हवा के संग;
पत्ते जमीन पर गिर रहे हैं,
गुनगुनाती हुई चांदनी में रंग.

मन मेरा भी...
उड़ने को बेताब है,
इस भीड़ और गंदगी की दुनिया से,
निकल जाने को तैयार है.

शायद बारिश आ जाएगी,
ज़र्रे-ज़र्रे को महका जाएगी;
चांदनी व बारिश में नहायेगा ये जहाँ,
झूमूंगा मै, इस खूबसूरत आकाश के तले.

इस मदहोशी के आलम में,
खोए रहने को जी करता है;
बंद कमरों में तो,
मेरा मन घुटता है.

अब तो बस इंतज़ार है
की बारिश कब आएगी,
मेरे तन-मन को भिगोएगी
व जन्नत का अहसास दे जाएगी.

दिन भर के शोर-शराबे के बाद,
ये मौसम कुछ ऐसा लगता है;
जैसे जन्जीरो में बंधे एक शख्श को,
गुल-ए-मैदान में छोड़ दिया गया हो.

Tuesday, 3 April 2012

वो सुकून

वो सुकून जो मैंने देखा उन बंद आँखों में,
सड़क के किनारे पड़ी पाइप में,
सो रहा है वो चैने-ए-सुकून से
मुझे तो मेरी व्यस्त जिंदगी, बेकार लगने लगी.

सूरज बरस रहा है ज़मी पर,
हर कोई है जल्दी में...
पर न जाने उस शक्स को क्यूँ,
सोने का ख्याल आ गया.

बढ़ी हुई दाढ़ी है,
पके हुए हैं बाल;
शायद उम्र के बीच में है वो,
पर फिक्र नही है किसी चीज की उसे...

मै तो चला जा रहा हूँ ऑटो में,
देखा है उसे सड़क के किनारे;
सुकून की तलाश तो हमें भी रहती है,
पर इस सुकून से मुझे डर लगने लगा है.

कोई तो जवाब दे मुझे,
कैसे मिलेगा मुझे, सुकून...
शायद ये जवाब ही है...!
जिसे उस आदमी ने सोते हुए कह दिया।

(Written on March 31, 2012)

Monday, 2 April 2012

वो नज़र आएगी

लास्ट इयर है उसका
महीने कुछ ही बचे हैं,
चले जाना है उसे
हम कर भी क्या सकते हैं.

अब फिर न सर्दी आयेगी
फिर न वो धूप में जाएगी,
न हम देख पाएंगे उसे
न वो यहाँ नज़र आएगी.

अब तो बस है यही तमन्ना
जी भर के उसे कुछ देर देखना,
शायद अब ये, एक याद ही रह जाएगी
ज्यादा नहीं पर, कुछ महीने तो वो याद आएगी,

कई दिनों से ढूंढ रहा हूँ उसे
की शायद दिखे तो कहीं,
आज दिखी भी एक पल के लिए
पर फिर, खो गई कहीं.

आशा है कल फिर दीदार होंगे
चाँद निकलेगा और रोशन होगा जहाँ,
डर इस बात का नहीं, की चाँद डूबेगा
डर ये है की चांदनी का किधर प्रभाव होगा.

उसकी तारीफ तो करना चाहता हूँ
पर किताबें भर जाएँगी,
और फिर वो ज़िन्दगी भर
मेरी लाइबे॒री में नज़र आएगी.

Sunday, 1 April 2012

अर्थ आॅवर

आज शाम को एक घंटे
मनाया गया अर्थ
hour ,
बंद कर दी लाइटें हमने
व अन्य चीज जो लेती elecreic पॉवर.

बहुत रोचक अहसास था,
मेरी ज़िन्दगी में तीसरी बार था,
कुछ करने की उत्सुकता थी
उर्जा बचाने का एक प्रयास था.

कसमे खाई हमने उस घंटे,
उर्जा तो हमीं बचाएंगे;
खुद तो बदलेंगे ही,
पूरे जहां में भी बदलाव लायेंगे.

पूरा विश्व आज मेरे साथ था,
कहीं न कहीं
हर हाथ में एक हाथ था;
प्रतिज्ञा कर रहे थे हम
धरती को बचाने की.
मानवता को आगे ले जाने व
खुशिओं की बहार लाने की.

दोस्तों के साथ में,
घूम रहा था उस घंटे...
रास्ते में खड़े, ऊँचे पेड़,
आकाश में निकले तारे,
शांत थी शमा,
हल्की हवा चलती हुई
यह एक खूबसूरत अहसास था.

बातें की हमने अर्थ आॅवर की,
चिंता की पर्यावरण की,
फैसला किया की हमी,
बदलेंगे ये जहां.

पूरा विश्व गवाह था,
उस ऐतिहासिक पल का;
लोगों ने मतलब समझा,
उर्जा संरक्षण का.