Sunday, 15 April 2012

और फिर रोना आया...!

न जाने क्यूँ?
मुझे फफक - फफक कर रोना आया,
सांस गले तक आई
और फिर रोना आया.

अच्छा लगा बहुत
रोने में मुझको,
कोशिश की मैंने
और रोने की,
और फिर रोना आया.

पहली बार लगा की
रोने में भी एक ख़ुशी है,
और आँसुओं का क्या,
वो बहने लगे...
और फिर रोना आया.

ख़ुशी इतनी मिली मुझको
रोने में,
की हँसना भी फीका लगा,
और फिर...
और फिर रोना आया.

जी चाहता है रोता रहूँ,
एक अजीब सा एहसास
पीता रहूँ,
हर पल एक ख़ुशी चाह,
और फिर रोना आया.

No comments:

Post a Comment