Monday, 2 April 2012

वो नज़र आएगी

लास्ट इयर है उसका
महीने कुछ ही बचे हैं,
चले जाना है उसे
हम कर भी क्या सकते हैं.

अब फिर न सर्दी आयेगी
फिर न वो धूप में जाएगी,
न हम देख पाएंगे उसे
न वो यहाँ नज़र आएगी.

अब तो बस है यही तमन्ना
जी भर के उसे कुछ देर देखना,
शायद अब ये, एक याद ही रह जाएगी
ज्यादा नहीं पर, कुछ महीने तो वो याद आएगी,

कई दिनों से ढूंढ रहा हूँ उसे
की शायद दिखे तो कहीं,
आज दिखी भी एक पल के लिए
पर फिर, खो गई कहीं.

आशा है कल फिर दीदार होंगे
चाँद निकलेगा और रोशन होगा जहाँ,
डर इस बात का नहीं, की चाँद डूबेगा
डर ये है की चांदनी का किधर प्रभाव होगा.

उसकी तारीफ तो करना चाहता हूँ
पर किताबें भर जाएँगी,
और फिर वो ज़िन्दगी भर
मेरी लाइबे॒री में नज़र आएगी.

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