वो सुकून जो मैंने देखा उन बंद आँखों में,
सड़क के किनारे पड़ी पाइप में,
सो रहा है वो चैने-ए-सुकून से
मुझे तो मेरी व्यस्त जिंदगी, बेकार लगने लगी.
सूरज बरस रहा है ज़मी पर,
हर कोई है जल्दी में...
पर न जाने उस शक्स को क्यूँ,
सोने का ख्याल आ गया.
बढ़ी हुई दाढ़ी है,
पके हुए हैं बाल;
शायद उम्र के बीच में है वो,
पर फिक्र नही है किसी चीज की उसे...
मै तो चला जा रहा हूँ ऑटो में,
देखा है उसे सड़क के किनारे;
सुकून की तलाश तो हमें भी रहती है,
पर इस सुकून से मुझे डर लगने लगा है.
कोई तो जवाब दे मुझे,
कैसे मिलेगा मुझे, सुकून...
शायद ये जवाब ही है...!
जिसे उस आदमी ने सोते हुए कह दिया।
(Written on March 31, 2012)
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