Thursday, 5 April 2012

झूमूंगा मै

हवा बह रही है, तेज
बदल उमड़ रहे है आकाश में,
चाँद दिख रहा था अभी...
पर अब बादलों में गुम हो गया.

पेड़-पोधे झूम रहे हैं,
बहती हुई हवा के संग;
पत्ते जमीन पर गिर रहे हैं,
गुनगुनाती हुई चांदनी में रंग.

मन मेरा भी...
उड़ने को बेताब है,
इस भीड़ और गंदगी की दुनिया से,
निकल जाने को तैयार है.

शायद बारिश आ जाएगी,
ज़र्रे-ज़र्रे को महका जाएगी;
चांदनी व बारिश में नहायेगा ये जहाँ,
झूमूंगा मै, इस खूबसूरत आकाश के तले.

इस मदहोशी के आलम में,
खोए रहने को जी करता है;
बंद कमरों में तो,
मेरा मन घुटता है.

अब तो बस इंतज़ार है
की बारिश कब आएगी,
मेरे तन-मन को भिगोएगी
व जन्नत का अहसास दे जाएगी.

दिन भर के शोर-शराबे के बाद,
ये मौसम कुछ ऐसा लगता है;
जैसे जन्जीरो में बंधे एक शख्श को,
गुल-ए-मैदान में छोड़ दिया गया हो.

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