Monday, 7 August 2017

अगर मैं पंछी होता...

अगर मैं पंछी होता...
खुले आकाश में पंख फैलाकर उड़ता
पेड़ों की डालियों पर चहचहाता घूमता
तालाबों-झीलों में नहाता घूमता
धरती की सैर करता और झूमता
अगर मैं पंछी होता!

हर सुबह एक नया जीवन होता
पैसे कमाने का न कोई झंझट होता
न बंगला चाहिए होता न गाड़ी चाहिए होती
न टीवी न कम्प्युटर चाहिए होता
खाने के लिए जूझना न होता
अगर मैं पंछी होता!

न कोई चिंता होती न नफरत होती
न स्वर्ग चाहिए होता न नर्क चाहिए होता
न अमीर-गरीब, न नींच-उंच
न धर्म चाहिए होता न भगवान चाहिए होता
अगर मैं पंछी होता!

न पिछले कल का गम होता न अगले कल की चिंता
न युद्ध करना पड़ता और न ही हिंसा
न प्रदूषण करता, न धरती बर्बाद करता
बेवजह दिमाक लेकर मैं बुद्धू न बनता
सीमा भी न होती, सैनिक भी न होते
अगर मैं पंछी होता!

चहचहाता-मुस्कुराता-खिलखिलाता
बागों में, झरनों पर, पहाड़ों पे गाता
दोस्तों संग लंबी उड़ान पर जाता
जो भी मिलता उसे प्रेम से खाता
पौधों में थोड़ा परागण भी कर आता
अगर मैं पंछी होता!

अब तो बस यही तमन्ना है...
अगर जीना है तो पंछिओं की तरह जीना है
क्या पा गया इंसान चाँद पे जाके
खुद धरती पर जीवन को संकटमय बनाके
आज तो मैं प्रकृति के सारे रस-पान कर चुका होता
अगर मैं पंछी होता!

Meri Kriti - Abhishek Dubey (07/08/14)

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