ढलती हुई शाम,
खेतों में दूर-दूर तक फैली खामोशी,
वीरानापन...
थमे खड़े पेड़,
जमीन पर तैरता कुहासा,
और इस
मौत के समान मौन वातावरण में,
धरती निर्जन सी नज़र आती है।
आकाश में निकले कुछ तारे,
दूर कहीं हल्की रोशनी,
धरती की गरमाहट भरी महक,
मैंने महसूस किया...
इन पलों ने पूरी घटना को
मुझमें प्रवाहित कर इसे
मेरी कविता के शब्द बना दिए!
जिनमें मुझे...
धरती निर्जन सी नज़र आती है।
धरती हमेशा जीवित नहीं रहती,
इस पल में...
पशु-पक्षी, मानव सभी मानो विलुपता हो गए;
ये जगह ऐसी लगती है कि
जैसे यहाँ कभी कोई आया ही न हो।
अगर कुछ जीवित लगता है...
तो वो है बहता हुआ पानी
मानो केवल वही ज़िंदा हो!
पर चारों तरफ फैली इस मायूसी में,
धरती निर्जन सी नज़र आती है।
धरती हमेशा हँसती-खेलती नहीं,
वृक्ष हमेशा घूमते नहीं,
जीव-जन्तु हमेशा विचरण नहीं करते,
आवाजों से भरा वातावरण कभी
खामोश हो जाता है...
और इस पल यहाँ
गम जैसा दु:ख भरा माहोल छाता है
और...
धरती निर्जन सी नज़र आती है।।
खेतों में दूर-दूर तक फैली खामोशी,
वीरानापन...
थमे खड़े पेड़,
जमीन पर तैरता कुहासा,
और इस
मौत के समान मौन वातावरण में,
धरती निर्जन सी नज़र आती है।
आकाश में निकले कुछ तारे,
दूर कहीं हल्की रोशनी,
धरती की गरमाहट भरी महक,
मैंने महसूस किया...
इन पलों ने पूरी घटना को
मुझमें प्रवाहित कर इसे
मेरी कविता के शब्द बना दिए!
जिनमें मुझे...
धरती निर्जन सी नज़र आती है।
धरती हमेशा जीवित नहीं रहती,
इस पल में...
पशु-पक्षी, मानव सभी मानो विलुपता हो गए;
ये जगह ऐसी लगती है कि
जैसे यहाँ कभी कोई आया ही न हो।
अगर कुछ जीवित लगता है...
तो वो है बहता हुआ पानी
मानो केवल वही ज़िंदा हो!
पर चारों तरफ फैली इस मायूसी में,
धरती निर्जन सी नज़र आती है।
धरती हमेशा हँसती-खेलती नहीं,
वृक्ष हमेशा घूमते नहीं,
जीव-जन्तु हमेशा विचरण नहीं करते,
आवाजों से भरा वातावरण कभी
खामोश हो जाता है...
और इस पल यहाँ
गम जैसा दु:ख भरा माहोल छाता है
और...
धरती निर्जन सी नज़र आती है।।

No comments:
Post a Comment