Saturday, 1 July 2017

भईया चले पन्नी लटकाए

हाथ झुलावत निकरे घर से,
पहुंचि गए बजार,
सौदा लिहिन पन्नी मां भर-भर,
बने बड़ा होसियार.

घर पहुंचि कय एक पन्नी मां,
सब्जी कय छिलका भरि बहाइन,
गइया खाइस पन्नी छिलका कै साथे,
अइसै वहका मरवाइन.

दूसर पन्नी कूड़ा कै साथे,
दिहिन सड़किया पै बहाय,
पन्नी उड़ी औ गय नाली मां,
रूका पानी सड़य-गंधाय.

तीसर पन्नी कूड़ा मां,
डारि कय दिहिन जलाय,
भवा खूब गंधउरा धुंआ,
जौन सबके सांसेम जाय.

मच्छर फइले, बीमारी फइली,
सड़क गली गंधवाइन,
फिर लागे कोसय सरकार का,
कि पन्नी कांहे नाहीं बंद करवाइन.

तौ भइया पन्नी बंद करौ अब,
झोरा लियव निकार,
न मरंय गाय, न हुअय गंदगी,
सुधरि जाय अब शहर हमार.

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